26 मई 2026 को पाकिस्तान की राजनीति और विदेश नीति के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा गया। ख्वाजा मुहम्मद असिफ, प्रधानमंत्री और पाकिस्तान सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनकी सरकार कभी भी उन समझौतों पर हस्ताक्षर नहीं करेगी जो उनके मूलभूत आदर्शों के विपरीत हैं। इसका सीधा संबंध उस प्रस्ताव से था जिसे डोनाल्ड जे. ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति ने 'आब्राहम समझौतों' (Abraham Accords) में शामिल होने के लिए जारी किया था।
इस घटना का संदर्भ समझना जरूरी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल (Truth Social) पर एक अनुरोध—जिसे उन्होंने 'अनिवार्य' बताया था—जाहीर किया था। वे चाहते थे कि पाकिस्तान सहित सऊदी अरब, कतर, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन जैसे मुस्लिम बहुल देश इस समझौते पर हस्ताक्षर करें। लेकिन यहाँ मोड़ आता है: ट्रंप ने इसे सिर्फ एक शांति समझौता नहीं बनाया, बल्कि इसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वार्ताओं से सीधे जोड़ दिया।
आदर्शवाद बनायएय वास्तविकता: पाकिस्तान की स्थिति
ख्वाजा मुहम्मद असिफ ने अपने बयान में जो कहा, वह पाकिस्तान की दशकों पुरानी विदेश नीति का प्रतिबिंब था। उनका तर्क सरल था: "जब तक फिलिस्तीन को राज्य का दर्जा नहीं मिलता, तब तक इज़राइल की स्थिति अपरिवर्तित रहेगी।" यह कोई नई नीति नहीं है। 1948 में इज़राइल के गठन के बाद से पाकिस्तान ने कभी भी इसकी मान्यता नहीं दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान ने खुद को एक 'आदर्शवादी फंदे' में फंसा लिया है। भू-राजनीतिक विश्लेषक निरवा महता के अनुसार, पाकिस्तान ने खुद को फिलिस्तीन के मुद्दे का सबसे बड़ा समर्थक बनाकर रखने का फैसला किया है। इसका मतलब यह हुआ कि अब किसी भी हालत में इज़राइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करना पाकिस्तान के घरेलू राजनीतिक परिदृश्य में असंभव है।
सोचिए, पाकिस्तान के पासपोर्ट में इज़राइल का नाम तक नहीं होता। वहां इज़राइली नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध है, और पाकिस्तानी नागरिकों के लिए वहां जाना लगभग अशक्य है, सिवाय कुछ बहुत ही सीमित धार्मिक यात्राओं के। ऐसे में, अमेरिकी दबाव के बावजूद, इस्लामाबाद के पास वैकल्पिक रास्ता नहीं था।
अब्राहम समझौते: क्या है और क्यों बदला?
अब्राहम समझौते वाशिंगटन डीसी 2020 में हुए थे, जब संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सुडान और मॉरिशस ने इज़राइल के साथ संबंध सामान्य करने के लिए हस्ताक्षर किए थे। यह 25 सालों में पहली बार था जब अरब देशों ने इज़राइल को मान्यता दी थी।
Study IQ IAS के भू-राजनीतिक विश्लेषक अंकित अग्रवाल बताते हैं कि इस समझौते का नाम 'अब्राहम' इसलिए रखा गया क्योंकि यह तीन प्रमुख धर्मों—यहूदी, ईसाई और इस्लाम—के साझा पूर्वज का प्रतीक है। उनका कहना है, "यहूदी और मुस्लिम दोनों अब्राहम के वंशज माने जाते हैं, इसलिए यह समझौता 'अब्राहम के वंशजों के पुनर्मिलन' को दर्शाता है।" हालांकि, पाकिस्तान के लिए यह धार्मिक एकरूपता राजनीतिक रूप से स्वीकार्य नहीं थी।
ईरान कार्ड और बढ़ता दबाव
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि ट्रंप ने समझौते को केवल इज़राइल-अरब संबंधों तक सीमित नहीं रखा। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने मध्य पूर्व वार्ताओं के दौरान यह भी सुझाव दिया कि ईरान को भी इस समझौते पर हस्ताक्षर करने चाहिए। बीबीसी न्यूज़ के विश्लेषण के अनुसार, यह सुझाव व्यावहारिक रूप से असंभव है, क्योंकि ईरान की संवैधानिक स्थिति स्पष्ट है: "फिलिस्तीन को अस्तित्व मिलना चाहिए और इज़राइल को नहीं।"
अमेरिकी रक्षा मंत्री द्वारा अब्राहम समझौतों की प्रक्रिया को ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वार्ताओं से जोड़ना एक अभूतपूर्व राजनयिक चाल थी। इसने इस्लामाबाद पर और भी अधिक दबाव डाला। लाइव हिन्दुस्तान की राजनयिक रिपोर्टिंग के अनुसार, ट्रंप प्रशासन द्वारा समझौते को 'अनिवार्य' घोषित करने ने पाकिस्तान को एक कठिन द्विधा स्थिति में डाल दिया है।
राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियां
पाकिस्तान की सुरक्षा स्थापना, जिसमें इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) और राष्ट्रीय सुरक्षा विभाग शामिल हैं, ने रक्षा मंत्री असिफ के इनकार का समर्थन किया। सरकारी दस्तावेजों से पता चलता है कि उन्हें चिंता थी कि यदि वे इस समझौते में शामिल हुए, तो इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) में उनकी विश्वसनीयता कम हो जाएगी। OIC, जिसका मुख्यालय सऊदी अरब के जेद्दाह में है, में 57 सदस्य देश शामिल हैं।
यह मामला पाकिस्तान की विदेश नीति के लिए एक बड़ी चुनौती है। एक तरफ अमेरिका के साथ महत्वपूर्ण संबंध बनाए रखने की आवश्यकता है, और दूसरी तरफ फिलिस्तीन के मुद्दे पर अपनी ऐतिहासिक स्थिति बनाए रखने की जिद। 1948 के पहले अरब-इज़राइली युद्ध के बाद से, पाकिस्तान ने 12 अलग-अलग सरकारों और कई सैनिय शासकों के तहत इस स्थिति को बनाए रखा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अब्राहम समझौते क्या हैं और इनका नामकरण क्यों हुआ?
अब्राहम समझौते 2020 में इज़राइल और कुछ अरब देशों (UAE, बहरीन, सुडान, मॉरिशस) के बीच हुए शांति और संबंध सामान्यीकरण के समझौते हैं। इनका नाम अब्राहम इसलिए रखा गया क्योंकि यह यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों के साझा पूर्वज को दर्शाता है, जिसका उद्देश्य 'अब्राहम के वंशजों' के बीच सामंजस्य लाना था।
पाकिस्तान ने अमेरिकी प्रस्ताव को क्यों अस्वीकार किया?
पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव को इसलिए अस्वीकार किया क्योंकि इसकी विदेश नीति का आधार यह है कि जब तक फिलिस्तीन को स्वतंत्र राज्य का दर्जा नहीं मिलता, तब तक इज़राइल की मान्यता नहीं दी जाएगी। ख्वाजा मुहम्मद असिफ ने स्पष्ट किया कि यह उनके मूलभूत आदर्शों के विपरीत होगा।
डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को क्यों 'अनिवार्य' बताया?
ट्रंप प्रशासन ने मध्य पूर्व में एक व्यापक शांति ढांचे को बनाने के लिए इस समझौते को केंद्र में रखा था। विशेष रूप से, इसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वार्ताओं से जोड़कर, अमेरिका चाहता था कि क्षेत्रीय मुस्लिम देश इसमें शामिल होकर एक सामूहिक सुरक्षा और राजनयिक समझौता करें।
इस निर्णय का पाकिस्तान की अंतर्राष्ट्रीय छवि पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
इस निर्णय से पाकिस्तान की इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) में नेता के रूप में अपनी विश्वसनीयता बनी रहेगी, लेकिन अमेरिका के साथ इसके संबंधों में तनाव आ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पाकिस्तान को एक कठिन राजनयिक स्थिति में डालता है जहाँ उसे आदर्शवाद और वास्तविक राजनीति के बीच संतुलन बनाना होगा।
क्या अन्य मुस्लिम देशों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया?
ट्रंप ने सऊदी अरब, कतर, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन जैसे देशों को भी इसमें शामिल होने का अनुरोध किया था। हालांकि, पाकिस्तान के अलावा अन्य देशों की प्रतिक्रियाएं और उनकी स्थिति अलग-अलग हो सकती है, क्योंकि कई देशों ने पहले ही इज़राइल के साथ संबंध सामान्य कर लिए हैं या अलग तरह की राजनीतिक रणनीति अपनाई हुई है।